|| कामाख्या देवी मंदिर || Kamakhiya Devi Mandir
कामाख्या मंदिर
कामाख्या देवी मंदिर जो कि पुरे भारत में प्रसिद्ध है | यह मंदिर ५२ शक्तिपिठो में से एक है | यह मंदिर ज्यादातर आघोरी और तांत्रिको का गढ माना जाता है | कामाख्या देवी मंदिर असम कि राजधानी दिसपुर कर समीप गुवाहाटी से 8 किमी दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है | यह मंदिर भारत के बाकि सारे मंदिरों से काफी अलग है क्युकी इस मंदिर में किसी मूर्ति कि या किसी तस्वीर कि पूजा नहीं होती बल्कि इस मंदिर में देवी कि योनी कि पूजा होती है | यही नही आज भी देवी रजस्वला होती है | हर साल 3 दिन के लिये देवी रजस्वला होती है और 3 दिन के लिये मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते है | और इस दोरान वह आम्बुबाची मेले का शुभारम होता है और देशभर से भरी श्रद्धालु माता के इस मेले में आते है | यह मेला हर साल आषाद के महीने यानि जून के महीने में इस मेले का आयोजन करा जाता है | कामख्या देवी मंदिर एक इसी जगह है जहा 10 तांत्रिक देवियों कि पूजा कि जाती है और यही नही यहा अघोरी व तांत्रिकी विधिय के लिये दूर दूर से साधू आते है जिनके बारे में किसी को पता तक नही होता है |
कामाख्या देवी मंदिर का इतिहास
पोराणिक कथाओ के अनुसार जब देवी सती के पिता राजा दक्ष ने महायज्ञ का आयोजन करा मगर उन्होंने भगवान शिव को छोड़ कर सारे देवी देवताओ को बुलाया इसी बात के चलते सती बहुत गुस्सा हो गयी और शिव जी के मना करने के बावजूद वह अपने पिता से इस बारे में बात करने के लिये चली गयी | जब वह वहा पहुची तो देखा यज्ञ चल रहा था और उसी समय वह अपने पिता से बोली कि यह कैसी बात है कि उन्होंने सभी को बुलाया मगर अपनी बेटी और दामाद को नही | जब उन्होंने पूछा तो राजा दक्ष ने उनसे कहा कि उनका कोई रिश्ता नही है शिव और उनकी पत्नी से उस्सी समय माता सती को गुस्सा आया क्योंकि राजा दक्ष ने माता सती के साथ साथ भगवान शिव कि भी अवज्ञा करी और माता सती ने वाही पर यज्ञ में कूद गयी | जब यह बात शिवजी को पता चली वह अत्यंत दुखी हो गये और माता सती के शरीर को पुरे बह्मंड में लेकर घुमने लगे | इस वियोग के चलते पृत्वी सब उथल-पुथल होने लग गया था और इसी कारण भगवान विष्णु ने अपने चक्र से देवी सती के अंग काटने शुरू कर दिए और यह अंग धरती के जिन-जिन स्थानों पर गिरे वह श्क्तिपिठो निर्माण हुआ उन्हीने में से माता सती कि योनी जहा पर गिरी वह पर उसने एक पत्थर का आकर ले लिये और वह स्थान आज कामख्या देवी ने नाम से प्रचलित है |
ऐसे ही जब सती के सारे अंग धरती पर गिरे तब भगवान शिव एक गुफा में तपस्या करने के लिये चले गये और यह तपस्या बहुत लम्भी चली | फिर समय गुजरा और रजा हिमालय के घर एक कन्या का जन्म होता है किसका नाम पार्वती होता है | पार्वती और कोई नही माता सती का ही रूप थी | पार्वती जी हमेशा से भगवान शिव कि ही आराधना करती थी और उन्हें ही वर के रूप में चाहने लगी | मगर जब पार्वती बड़ी हुई तो उनके पिता ने उनका विवाह करना चाहा मगर माँ पार्वती घर छोड़ कर चली गयी और जंगल में जा कर तपस्या करने लगी | भगवान विष्णु को पता था कि यही माता सती का रूप है और यही भगवान शिव कि अर्धंगी बनेगी और वह रक्षा का कि जिमेदारी निभाने लगे | तभी एक राक्षस जिसका नाम ताड़का आसुर था वह ब्रह्मा जी को प्रसन कर 2 वरदान मांगता है | पहला कि वह पूरी दुनिया में सबसे बुद्धिमान और ताकतवर हो और उसकी बरबरी कोई नही कर पाए , दूसरा कि उसका वध सिर्फ भगवान शिव और माता का पुत्र ही कर पाएगा | और धीरे धीरे उसका आतंक बड़ने लगा इसी को देखते हुए भगवान विष्णु ने भगवान विष्णु कि तपस्या तोड़ने का सोच और ये जिमा कामदेव को सोपा गया जब कामदेव ने भगवान शिव का तपस्या से बहार लाना चाहा मगर भगवान शिव तपस्या से बहार नही आये और इसी लिये उन्होंने एक फूलो का बाण शिवजी पर चलाया को भगवान शिव गुस्सा हो गये और कामदेव को भस्म कर दिया | कामदेव कि इसी स्थिति पर उनकी पत्नी देवी रती दुखी हुई और उनको जीवित करने कि विनती करने लगी मगे शिवजी ने उनको जीवित तो करा मगर उनका शरीर उनको नही मिल पाया और उन्होंने उन से कहा कि तुम नीलांचल पर्वत पर जाओ वह माता का शक्तिशाली स्थान है वह पर जेक सेवा करो | शिवजी कि बात मन कर वह माता कि सेवा करने लगे और कामदेव को उनका शरीर फिर से मिला और तब भी से इस स्थान का नाम कामख्या पड गया |
आम्बुबाची मेला
आम्बुभाची मेला हर साल आसाढ़ के महीने में मनाया जाता है माना जाता है कि माँ कामख्या 3 दिन के लिये रजस्वला होती है उस समय यह मेला लगता है और मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते है | कपाट बंद करते समय मंदिर के अन्दर एक सफेद कपड़ा रखा जाता है | इस मेले में कई तांत्रिक साधू अपनी सिधिया ग्रहण करते है और जिन लोगो को भुत या तांत्रिक सम्बन्द कार्य के लिये आते है | इस अवसर पर यहा पर अलग अलग जानवरों कि बलि जाती है और कहते है जो यह बलि देखता है उसका पूरा साल सुख और खुशाल बीता है |यही नही इस समय ये 3 दिन त्य्हर कि तरह मनाए जाता है | जब 3 दिन पुरे होते है तब मंदिर के कपाट खोले जाते है और वह सफ़ेद कपडा लाल रंग का हो जाता है और व्ही कपडा लोगो को प्रसाद के तोर पर दिया जाता है और लोग उससे अपने भगवान घर में रखते है और उसकी पूजा करते है यही नही इन 3 दिनों के लिये वह पर बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी लाल रंग कि हो जाती है |
क्या राज़ है ब्रह्मपुत्र नदी का ?
इस 3 दिनों ब्रह्मपुत्र नदी पूरी तरह से लाल रंग कि हो जाती है और लोग उससे माँ के रजस्वला होने कारण इसका लाल रंग होना बताते है व्ही वैज्ञानिको का कहना है कि यही नही के आस पास आयरन कि मात्र आधिक है इसी वजह से नदी का रंग लाल हो जाता है | मगर अगर इसके आस पास आयरन है तो यह नदी सिर्फ 3 दिन के लिये लाल रंग कि क्यों होती है ? अगर वैज्ञानिक सच है तो आस्था भी सच है क्यों कि नदी सिर्फ साल के 3 दिन ही लाल रंग कि होती है |
तांत्रिक विद्या
कामख्या मंदिर एक ऐसा मंदिर है जहा 10 तांत्रिक देवियों कि पूजा होती है | यहा पर देश दुनिया से तांत्रिक अपनी सिधिया लेने आते है | कहा जाता है कामख्या देवी में जा कर एक अलग ही सकती का एहसास होता है और यही नही वहा पर जा कर हर महिला को अपने अंदर एक अलग ही शक्ति महसूस होती है | तांत्रिक विद्या ही नही कामख्या देवी में एक विश्वविध्यालय है कोई कि तांत्रिक विश्विद्यालय है | जहा तात्रिक विद्या सिखाए जाती है | कामख्या देवी मंदिर कोई एसा वेसा मंदिर नही है बल्कि तांत्रिक सिधियो से भरा मंदिर है |
निष्कर्ष
कामख्या देवी मदिर एक ऐसा मंदिर है जहा जा कर हर महिला को एक अलग शक्ति का एहसास होता है व अपने आप को ज्यादा ताकतवर मानती है | कामख्या देवी मंदिर एक ऐसा मंदिर है जहा मूर्ति नही बल्कि एक महिला कि / माता कि योनी कि पूजा होती है और यही अंग महिला के शरीर का सबसे ज्यादा ताकतवर अंग माना जाता है| यही नही कामख्या मंदिर एक ओरत कि पूजा को ही नही बल्कि एक ओरत कि ताकत को दर्शाता है |

Comments
Post a Comment