|| नेपाल कि कुमारी प्रथा || Kumari Pratha Of Nepal

 

नेपाल भारत और चीन के बीच का देश है जो वेसे तो बहुत छोटा है जिसकी कुल आबादी 3.05 कड़ोड़ है लेकिन यह देश बहुत सारे आजुबो से भरा हुआ है | नेपाल जो कि यहा के मंदिरों के साथ साथ यहा के त्युहारो कि वजह से भी प्रसिद्ध है यहा के मंदिरों में सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है पशुपतिनाथ मंदिर जो कि हिन्दूओ के लिये बड़ा महत्वपूर्ण है जो कि बारह ज्युतिरलिंगो में से एक है|नेपाल भी भारत के समान ही सभी धर्मो को माने वाला देश है जहा  हिन्दू , इस्लामिक  ,बुद्ध ,और जैन धर्म के लोग रहते है | जहा पर दुनिया का सबसे ऊचा पर्वत माउन्ट एवरेस्ट स्थित है | गौतम बुद्ध का जन्म भी नेपाल में ही हुआ था | साथ ही काठमांडू जो कि नेपाल कि राजधानी है | नेपाल में सिर्फ इन्ही चीजो के लिये नही बल्कि वह के मंदिरों के प्रसिद्ध है वह 3000 से भी ज्यादा मंदिर है नेपाल के हर मोड़ पर आपको एक मंदिर दिखेइ देगा शायद इसी लिये नेपाल भारत के ही जेसा दिखेइ देता है और यहा तक वह के त्युहार भी भारत के त्युहारो से मिलते है नेपल में अलग अलग प्रकार से डांस व संगीत होता है जेसे थारू शिख और पीकॉक डांस के बारे में तो आपने सुना ही होगा यहा पर दर्शेन और तिहर जो वह के मुख्य त्युहार है उन्हें धूमधाम के साथ मनाया जाता है | नेपाल में ज्यादातर दालभात खेई जाती है और वह लोग जीवनयापन के लिये खेती करते है | नेपाल के लोग भी भारत कि तरह ही भगवान पर ज्यादा विस्वास करते है यही चीजे है जो नेपाल और भारत को एक करती है मगर एक इसी प्रथा को इसको अलग बताती है वह है कुमारी देवी प्रथा को कि नेपाल कि मुख्य प्रथा है | इस प्रथा में नेपाल के राजा भी कुमारी देवी का आशीर्वाद लेने हर साल आते है यह प्रथा एक तरह से एक लड़की को देवी के रूप में मान कर उसकी पूजा करने के लिये बनाई गयी हे जो कि एक लड़की के भीतर शक्ति को बताती है | 

कुमारी देवी परम्परा क्या  है ?

कुमारी देवी या जीवित देवी नेपाली धार्मिक परम्परा में दिव्या शक्ति के रूप में चुनी गयी कुवारी कन्या कि पूजा करने कि पारम्परा है | ऐसा माना जाता है कि उस कन्या पर देवी दुर्गा जिन्हें देवी तलेजू मानते है उनका साया उस कन्या में होता है इसीलिए उसकी पूजा करी जाती है | नेपाल में कुवारी कन्या वहा कि नेवारी बोद्ध समुदाय के शाक्य काबिले से चुनी गयी पूर्व योवन लड़की होती है | ऐसा माना जाता है कि वह कन्या देवी तलेजू का अवतार है जब उसका पहला मासिक धर्म शुरू होता है तो ऐसा माना जाता है कि देवता उसका शरीर को खाली कर देते है | गंभीर बीमारी या चोट से खून कि बड़ी हनी भी देवता कि हनी का करण बनती है कहा जाता है कि शकत ग्रन्थ देवी म्हाथ्यम में चंडी देवी ने कहा हे कि ब्र्मंड में सभी महिला व जीवित प्राणियों ने वह निवास करती है कुमारी का सम्पूर्ण अनुष्ठान इसी श्लोक पर आधारित है लेकिन देवी कि पूजा करते समय उसकी पवित्रता को देखते हुए एक परिपक्व महिला के बजाए केवल युवा लड़की को ही चुना जाता है |

कुमारी प्रथा का इतिहास 

पुराणिक कथाओ में इस परम्परा के शुरू होने के पीछे कई कथाए शामिल है जिनमे सबसे फेले आती है देवी तलेजू और रजा जयप्रकाश मल कि कहानी ये कहानी है मल वंश के अंतिम शासक रजा जयप्रकाश मल कि जो कि हर रोज़ अपने एक मित्र के साथ पासे का खेल यानि त्रिपसा खेल खेलते जाया करते थे और यह दोस्त और कोई नही बल्कि देवी तलेजू ही थी | देवी ने राजा एक वचन दिया था कि वह किसी को उन के बारे में नही बताएगे और इसी वचन के चलते राजा चोरी छुपे हर रोज़ उनके पास त्रिपसे का खेल खेलने आया करते थे | एक दिन रजा कि पत्नी ने उनसे इस बारे में पूछा मगर राजा उन्हें बिना बताए आ गये तभी रानी ने उनका पिचा करने का सोचा और एक रात वह राजा के पीछे पीछे चली गयी और देखा कि राजा एक कमरे के भीतर जा रहे है | जब उन्होंने उस कमरे को खोला तो देखा कि राजा के साथ देवी तलेजू थी और उसी समय देवी गायब हो गयी | देवी के गायब होते ही राजा रानी पर गुस्सा होने लगे और उस वचन के बारे में बताया राजा बड़े उदास हुए और देवी से विनती करी तब देवी तलेजू ने उनसे प्रकट होक कहा कि वह एक कन्या के रूप में जन्म लेगी जो कि नेवारी समुदाई कि होगी तबी से राजा उसी कन्या कि खोज में निकल गये थे |

इसी तरह एक और कहानी को इस परम्परा से जोड़ा गया है जो कि रजा जयप्रकाश कि ही है  जिसमे जब रजा जयप्रकाश मल शासक थे और उसी समय एक युवा लड़की को शहर से निर्वासित कर दिया था क्युकी यह डरता कि उस लड़की पर देवी दुर्गा का साया है जब रानी को युवा लड़की के बारे में पता चला तो वह गुस्सा हो गयी ओस उस लड़की को वापिस लेन को कहा जब उस लड़की को वापिस लाया गया तभी से उसकी पूजा शुरू हो गयी |इसी ही और भी कथाए प्रचलित है जो कि राजा त्रेकोक्य कि है मगर यह कहानी का सच होना बड़ा मुश्किल है क्युकी यह कहानी भी पहेली कहानी कि तरह ही है नगर इसमें कहा जाता है कि राजा देवी को एक गलत नज़र से देवी को देखते है और इसी वजह से देवी गायब हो जाती है जब उन्हें उस गलती का आबास होता है तो देवी उनसे कहती कि वह एक कन्या के रूप में प्रकट होगी जो कि नेवारी समुदाई कि होगी तभी से उस कनिया को खोजा गया और उसकी पूजा आरम्भ हो गयी | 

कुमारी देवी को कैसे चुना जाता है ?

कुमारी देवी को चुनने के लिये उस कन्या को कई बाधाओ का सामना करना पड़ता है यह परीशा को पाच मुख्य बुद्ध पुजारी के समक्ष लिया जाता है जिनमे पंच बुद्ध , शाही पुजारी , आचाजू , तलेजो के पुँजरी , और शाही ज्योतिषी लेते है | देखा जाए तो उस कन्या के बत्तीस गुण माता तलेजू के बत्तीस गुणों से मिलने चाहिए साथ ही उसका स्वास्थ्य सही होना चाहिए , ध्यान रहे उस कन्या के कभी खून न निकला हो या कोई बीमारी से ग्रसित न हो , वह कन्या बेदाग हो और उसके अभी तक एक दात भी न गिरा हो मतलब  दूध के दात भी न टूटे हो | यही नही कन्या के गाय के तरह आखो कि पलके हो , शंख के समान गर्दन , बरगद के समान शारीर , हिरन के सामान जांघ ,शेर जेसी छाती , और आवाज़ बतख कि तरह स्पष्ट और कोमल ,साथ ही उस कि आखे कलि होनी चाहिए और सुन्दर हाथ व पैर होने चाहिए | कन्या शांत और निडर हो उसकी कुंडली राजा कि कुंडली से मिलनी चाचिए और परिवार कि भी जाच करी जाती है | जब पुजारी कन्या को चुन लेते है तो उसकी असली परीक्षा ली जाती है और यह परीक्षा होती है दशेई के दिन जिससे विजयदशमी भी कहते है | कालरात्रि या कलि रात पर कलि माता को 108 भेसो और बकरियों कि बलि दि जाती है फिर उस कन्या को देवी तलेजू मंदिर ले जाया जाता है और आगन में छोड़ दिया जाता है झा पर उन जानवरों के शरीर पड़े होते है और नकाब भोश लोग नाचते रहते है और उससे एक मोमबत्ती के सहारे उन जानवरों के ऊपर से चलना होता है | अगर वह इस परीक्षा से डर  जाती है तो उसकी बजाई दूसरी कन्या को लाया जाता है और यदि वह निडर होकर पार कर लेती है हो उससे दूसरी परीक्षा के लिये तैयार करा जाता है | अगली परीक्षा में उस कन्या को एक बंद अँधेरे कमरे में रात बितानी होती हे जिसमे उन बलि दिए गये जानवरों के सर होते है और यह परीक्षा भी उससे बिना डरे देनी होती है  | इस परीक्षा के बाद उस कन्या के सामने पुरानी कुमारी देवी के वस्त्र व आभूषन रखे जाते है और उस कन्या को उससे पहचाने होते है | इन परीक्षाओ को जब वह कन्या पार कर लेती है तब उससे शुद्ध करा जाता है और पुजारी दुवारा गुप्त तांत्रिक अनुष्ठान करे जाते है और इसके पश्चात देवी तलेजू उस कन्या में प्रवेश कर लेती है | इन सब प्रक्रिया के बाद उससे देवी तलेजू मंदिर से सफ़ेद कपडे पल चोक के पार कुमारी देवी घर ले कर जाया जाता है | 

कुमारी देवी का जीवनयापन 

यह प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद उस कन्या का जीवन एक अलग ही मोड़ ले लेता है  | वह कन्या ओपचारिक अवसरों पर ही महल छोड़ सकती है | उसका परिवार उनसे मिलने कभी कभार ही आता है और वह भी उससे कुमारी देवी ही कह कर पुकारते है | कुमारी देवी को अपने माता पिता के अलावा किसी और से बात करने कि अनुमति नही होती है | वह सिर्फ लाल व सुनहरे कपडे ही पहनती है , बालो कि छोटी बनती है , और विशेष सकती के शुवरूप में उनके सर कर अग्नि नेत्र का चित्र बनाया जाता है | कुमारी देवी कभी जमीन पर नही चलती उनको हमेशा गोदी या पालकी पर ही रखा जाता है माना जाता है कि देवी को पवित्र रखना महत्वपूर्ण है नहीं तो तलेजू उनमे से स्थान छोड़ देगी | कुमारी को कभी भी जूते नही पहनाए जाते उन्हें सिर्फ मोज़े पहनाए जाते है वह भी लाल रंग के होने चाहिए | कुमारी महल में कुमारी देवी का एक कक्ष बना होता जहा वह भक्तो से मिलती है उस कक्ष में वह एक सोने के आसन में बेठती है और वही  सारे  लोग उनसे मिलते है |कुमारी देवी के पास कई लोग रक्त या मासिक धर्म सम्बंदित विकारो से पीड़ित लोग उनसे मिलने आते है माना जाता है कि कुमारी के पास इसी बीमारी कि विशेष शक्ति है | उनसे मिलने जाते समय लोग भोजन व प्रसाद लेकर जाते है और देवी उन्हें चुप चाप  सुविकर कर लेती है  मगर अब बात यह आती है कि जब वह किसी से बात नही कर सकती तो उन लोगो के सवालों का जवाब केसे देती है| कुमारी देवी अपने मुह के बावो के जरिये उनका जवाब देती है जब भी कुमारी देवी तेज़ हसने या रोने लगती है तो माना जाता है कि मुसीबत या म्रत्यु का संकेत होता है मगर जब वह शांत होकर भेट सुविकर कर लेती है तो सब कुछ सही होता है और ख़ुशी का संकेत होता है इसीलिए  कुमारी ज्यादातर शांत ही नजर आती है और यही कुमारी कि जिन्दगी है | कुमारी अपने जीवन के आठ - दस साल इन चीजो में दे देती है मगर फिर उनकी आगे कि जिन्दगी का क्या जब वह कुमारी के बाद एक आम लड़की बनती है तो वह केसे सभी से बराबरी कर पति है क्यों कि जब आठ - दस साल तक न किसी से बात करती हे न ही बाहरी दुनिया देख पाती  है |  परम्परिक तोर पर देखा जाए तो कुमारी को शिक्षा नही मिली क्युकी उन्हें व्यापक रूप से सर्वज्ञ माना जाता है हालकी आज के समय में उन्हें अपने जीवन में पुनः प्रवेश करने के बाद उनके लिये शिक्षा प्राप्त करना आवयशक बना दिया है | कुमारियो को अब सार्वजानिक स्कूल में जाने और क्लास के अन्दर एक एसा जीवन जीने कि अनुमति हे जो अन्य बाचे जीते है | जबकि कई कुमारी जेसे बक्पुर कि कुमारी स्कूल जाती है और काठमांडू कि रॉयल कुमारी निजी शिक्षको के माध्यम से अपनी शिक्षा प्राप्त करती है | 

निष्कर्ष 

कुमारी देवी प्रथा एक इसी प्रथा है जो कि एक लड़की के अन्दर कि देवी को सामने लेन का तरीका है जेसकी माता कलि सुव्यम यह कहती है कि वह हर प्राणी व हर महिला ले अन्द
र उपस्थित है | कुमारी देवी प्रथा के चलते हमे एक कन्या के अन्दर कि शक्ति देखने को मिलती है केसे वह कन्या अपना जीवन बिताती है और किस तरह सभी कि रक्षा करती है इस प्रथा को कई तरह से देखा जा सकता है मगर इसका मतलब एक ही है कि हर वह स्त्री को अपने हक़ के लडती है , हर वह लड़की जो इस दुनिया में मोजूद है उनमे सभी में देवी का निवास है |


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